Friday 16 February 2018

मुझे चाँद चाहिए

मुझे चाँद चाहिए 
इसलिए नहीं की उसके पीछे छिपा अंधकार 
उजागर हो सके 
बल्कि इसलिए की- वे किस्से, वे कहानियाँ, वे कविताएँ 
उजागर हो सकें 
जो चाँद के पीछे ढके अँधेरे में छिपी हैं 

उजागर हो सकें 
चाँद पर लिखने वाले कवि, कहानीकारों के भीतर 
बहुत सारे तारे 

और अँधेरे में जीवन की  एक नइ संभावना
तलाशे जाने की आत्मशक्ति 
हो सके जीवित 
हाँ, सिर्फ़ इसीलिए....मुझे चाँद चाहिए !

मैं चाँद को 
किसी स्त्री के जुड़े में नहीं सजाना चाहता 
बल्कि बसते में रखकर 
बहा देना चाहता हूँ नदी में 
ताकि बर्षों से अँधेरे में रह रहीं मछलियों को 
प्रकाश मिल सके 

चाँद को एक नई दुनिया मिल सके 
अँधेरे को अँधेरा मिल सके 
और तारों को अपनी पहचान मिल सके

ताकि सबकुछ बचा रहे

 जब मुझे मौका मिलेगा 
तब किताबें नहीं बाटूंगा 
मैं बच्चों को 
'जो लिखना चाहते है-कविता, कहानी या इतिहास'
कोरा कागज़ दूंगा 

एक चित्रकार को दूंगा 
ख़ाली कैनवास

और एक तलाशशुदा व्यक्ति की ज़रूरत 
कभी पूरी नहीं करूंगा 
औए ऐसे हर तलाशमंद व्यक्तियों में बाटूंगा 
ज़रूरत 

जिससे रटी न जाएँ किताबें
ज़रूरतों को हासिल न कर लिया जाए 

ताकि सबकुछ ख़त्म न हो  
जीवन में कैद न हो जीवन
और ढेर सारा जीवन बचा रहे   

अचार

इस बार दो बरनी भरकर बनाऊंगा 

एक में प्रेम कविताएँ भरूँगा 
और दुसरे में जीवन की अन्य तमाम कविताएँ 

जिन कवियों ने प्रेम के अलावा 
कभी कुछ और नहीं चखा 
उन्हें दूसरी बरनी से ख़ूब अचार खिलाऊंगा 
ताकि वे जान सकें 
कि कविताओं कि दुनिया बहुत बड़ी है 
और वह कई रंगों में ढली है 

जो मुझसे पूछते हैं 
बेस्वाद क्या है?
उन्हें, एक एक कलि प्रेम कविता खिलाऊंगा 

अब कविता की बात 
तो वह एक कैनवास है 
जो तरह तरह से 
कई रंगों में - कई ढंगों में 
रंगा जाता है 

तो कवियों से अनुरोध है 
जब भी नए सीजन का अचार डालें 
थोड़ा ही सही 
वेरायटी में बना लें 
धन्यवाद 

सरहद

हम सरहद ही तो है 
क्योंकि हमारे भीतर भी तो एक दुनिया है 

तो क्या हमारा होना ग़लत है?
या फिर सरहद का होना 
सही 

हम अपने बाहर और भीतर से 
ऐसे ही जूझते हैं 
जैसे- दो देश, दो दुश्मन 
  
तब तो गड़ी रहनी चाहिए- बागड़ें 
और दीवारों को पनपने देना चाहिए 
झगड़े की बात को 
फिर उत्सव की तरह देखना चाहिए 

अगर नहीं!
ता सारी सरहदों को पगडंडी में तब्दील किया जाना चाहिए 
ताकि राहगीर को रास्ता मिल सके  

गिनती

एक दिन जब मैं कविता लिखने बैठा 
तो सोचा 
शुरू से शुरू करता हूँ 
जैसे गिनती 
एक से शुरू होती है और सौ पर ख़त्म 

पर मुझे कविता का 'एक' मालूम न था
मैंने तमाम लोगों को खोजा 
अनगिनत किताबें पड़ी 
पर कविता का 'एक' हाथ न लगा 
और शुरू से शुरू करने कि तलाश 
कभी ख़त्म न हो सकी 

मैं चाहता था कि कविता को 
गिनती की तरह पड़ा जाए 
ताकि जीवन 'एक' से शुरू होकर 'सौ' पर ख़त्म न हो 

जीवन कहीं से भी शुरू किया जाए 
कहीं भी ख़त्म कर दिया जाए 
और तमाम गणनाओं को नेश्तानाबूत कर दिया जाए 
जीवन में जीवन शेष रहे 
 गिनती में न ढल जाए 

पहाड़

मैं सोचता हूँ की जब भी पहाड़ लिखूँगा 
कुछ नहीं लिखूँगा 
न लिखे जाने में छिपी है उसकी विशालता 

जैसे कोरा काग़ज 
समेटे होता है अपने भीतर 
हजारों किस्से 
अनगिनत कहानियाँ 
पर जब भी कोई कहानी उजागर होती है उसपर 
वह सिमटकर सिर्फ़ एक हो जाती है 

सिर्फ़ एक होना विशालता नहीं है 
एक में अनंत हूने का आभास 
पहाड़ होना है 

मैं कभी हिमालय नहीं होना चाहता 
एक ऐसा पहाड़ होना चाहता हूँ 
जहाँ कोई इंची टेप लेकर नहीं गया 
और उस छोटी सी ऊंचाई में विशालता को जीना चाहता हूँ 

ऊंचाई कभी पहाड़ों में नहीं होती 
वह हमारे भीतर छिपी होती है 
और उसका हमसे उजागर हो जाना 
हमारा पहाड़ हो जाना है 

Monday 5 February 2018

यार बंजारे

किताब एक ब्रह्माण्ड है
हर एक कहानी- एक दुनिया

बचपन में
जब भी मैं लुका छिपी खेला करता था
किताब का पन्ना पलटकर
उसमें घुस जाता था

मैं अपना जीवन शब्दों में तलाशता था
और शब्द अपना जीवन मुझमें
किताब के भीतर हम खेल रहे थे
लुका छिपी

जब मैं किताब से बाहर आया
सारे शब्द मेरे पीछे
किताब छोड़कर भाग आए

मेरे साथियों ने मुझसे पूछा
‘कि तू कहाँ छिपा था?’
मैंने उन्हें पूरी कहानी सुनाई

वे भाग पड़े
और किताब के ख़ाली पन्नों में घुस गए

अब मैं बड़ा हो गया हूँ
शब्द अब भी मेरे आस पास
पड़े रहते हैं- आज़ाद
मेरी तरह

मैं जब भी कोई किताब पड़ता हूँ
उसमें कई किरदार नज़र आते हैं
कुछ दफ्तरों में
कुछ काम में व्यस्त
वे किताब की कैद से आज़ाद होना चाहते हैं
वे बस जीना चाहते है

वे सब मुझे पहचानते हैं
कहते हैं
कि वे मेरे बचपन के दोस्त हैं

मैंने उन्हें कहा-
‘घबराओ मत दोस्तों, हम अभी भी खेल रहे हैं’
तुम सब किताब में नहीं फसे हो
तुम सब दुनिया में भी नहीं फसे हो
‘तुम सब, - दुनियादारी में फसे हो

अगर जीना है तो
वापस दुनिया में आओ
और, यार...बंजारे बन जाओ | 


( संजय शेफर्ड सर का लिए )

दो राहें

मैं चाहता हूँ, एक भूलभुलैया हो
कितना अच्छा हो


मैं और तुम जीवन भर उसमें
भटकें, भूलें और खो जाएँ

भूलभुलैया की चुप्पी में
कही कैद हो जाएँ- आवाज़ें
कितना अच्छा हो जो
मौन हमारा प्रेम हो जाए

एक पथ पर तुम चलती हो
एक राह मेरी भी है
कितना अच्छा हो अगर
ये दो राहें मिल जाएँ

मैं और तुम जीवन भर उसमें
भटकें, भूलें और खो जाएँ |

दुकान

बचपन में
एक बार मैंने माँ से कहा था
कि टिफिन में
किसी दिन दाल रोटी की जगह
सपने रख देना

उन दिनों मेरे स्कूल के रास्ते में
एक सपनों की दुकान थी
मैं कभी वहां नहीं गया
मुझे लगता था की सपने बड़े महंगे मिलते होंगे

इसलिए बचपन के दिनों में
अपने सपनों को मारकर
एक गुल्लक में
इकट्ठे करते रहा सिक्के

आज लदी हैं जेबें सिक्को से
जी चाहे तो दुकाने मोल लूं
पर पूरी दुनियां में कहीं
बचपन वाली
वह छोटी सी
सपनों वाली दुकान नहीं |

किताब

किताब मेरा घर है जिसके एक कोने में
जब कभी थक जाता हूँ
सो जाता हूँ मैं

दुसरे कोने में
सारे शब्द इकट्ठे हो जाते हैं तब
वे मेरी थकान को समझते हैं
इसलिए ख़ाली कर देता हैं
मेरा कोना – मेरा कमरा

किताब के भीतर शब्द चलते फिरते इंसान हैं
उनमें एक शब्द मेरी प्रेमिका है
और एक शब्द मैं

अक्सर एक शब्द ‘प्रेम’
हम दोनों के बीच पड़ा रहता है |

वसीयत

मेरे दफ्तर में
एक दिन, आदमी की शक्ल में
घर आया

उसने कहा-
मैं दुनिया के तमाम मकानों की तरफ से
आपसे दरख़ास्त करता हूँ
कि रूपये पर जैसे लिखा होता है
“मैं धारक को .... रूपए अदा करने का वचन देता हूँ”
वैसे ही हमारी वसीयत भी लिख दीजिए

साहब, मैं अब और बेघरों को
मरते नहीं देख सकता

लिखिए साहब, “कि घर तो बस घर है
वह मेरा या तुम्हारा नहीं होता
वह उसका होता है जो उसमें रहता है” |

इस्तीफ़ा

आज जब मैं अपने ऑफिस गया
वहां मैंने देखा
सारे कर्मचारी पक्षी हो गये हैं
पर सबके पंख गायब थे
सबकी उड़ान बाकी थी
वे अपने ख्याबों की कुर्सी पर बैठे
घडी के कांटे हो गये थे
जो टिक टिक तो कर रहे थे
पर सिर्फ, गुज़र रहे थे

मैंने अपने मालिक से कहा
मुझे मेरे पंख लौटा दीजिए
मैं अपनी उड़ान पूरी करना चाहता हूँ

मुझे पंख वापस नहीं मिले
एक दिन गुस्से में
मैंने उन्हें अपना इस्तीफ़ा थमा दिया
और मेरे पंख उगना शुरू हो गए |

जीवन

मैं एक खेल खेलना शुरू करता हूँ
कुछ समय बाद मुझे मालूम होता है
कि मैं
अब उस खेल में फस गया हूँ
मैं हँसता हूँ
रोता हूँ
चीख़ता चिल्लाता हूँ
अंततः जीत जाता हूँ
और निकल भागता हूँ इस खेल से

फिर मैं एक दिन
नया खेल शुरू करता हूँ |

परिंदे

एक बेघर के लिए हर रोज़
मैं अपना घर ख़ाली छोड़ जाऊंगा
शाम को घर से निकलूंगा
और जब भी लौटूंगा
सुबह में ढलकर आऊंगा

वक़्त ­- बेवक्त आते हैं अपने घर
मैं ऐसे लोगों में मिल जाऊँगा
परिंदे जो नहीं लौटते अपने घर
मैं परिंदा बनकर उनके घर जाऊंगा
उनके परिवार से अपने परिवार की तरह मिलूंगा
और फिर अगली मुलाक़ात के लिए
उड़ जाऊंगा

मैं अपनी ही दुनिया में
एक बेढंगी सी – ही सही
पर अपनी दुनिया बनाऊंगा
जहाँ जब चाहे आवारों सा आऊंगा
बंजारों सा जाऊंगा |

और अचानक कभी

मेरे कमरे में, एक खूँटी है
जिस पर टंगे हैं- मेरे सपने |

हर रोज़ मैं नींद से जब भी जागता हूँ
खूँटी से
उतार लेता हूँ एक सपना
और दिन भर
बीतता हूँ उसके संग

कभी कभी मेरा सपना
मेरा साथी बनकर मेरे साथ चलने लगता है
और कभी कभी
नाराज़ हो दूर खड़ा हो जाता है

इस लुका छिपी में
मैं थोड़ा थोड़ा ख़ुद को खर्च करता हूँ
और अचानक कभी
मैं ख़ुद, अपना सपना हो जाता हूँ |

बेघर

आज शाम जब मैं अपने घर लौटा
तब ‘शब्द’
चारों और बिखरे पड़े थे
कुछ मेरे बिस्तर पर
कुछ तकिए तले
और कुछ खूँटी पर टंगे हुए थे |

मेरे कपडों के खीसों में भी दुबके थे
शब्द

किताब ने उनसे अपना कमरा
ख़ाली करवा लिया था
सुनने में आया है
उन पन्नों पर अब से अमीर शब्द रहेंगे
वे विदेश से आये हैं |

बटुआ

वह जब भी अपने खींसे से
बटुआ निकालता है
यादें निकाल लेता है

यादें तस्वीर में नहीं होती कभी
वह छिपी होती हैं
हमारे भीतर ही कहीं, पहले से

बटुए का खुलना
हमारी यादों का उजागर हो जाना है
हमसे |

जब खुलता है तब चलता है
जीता है
और फिर पड़ा रहता है
किसी कोने में
‘जीवन’, एक राही की जेब में रखा बटुआ है |